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संस्कृत श्लोक | Best Sanskrit Shlok with Hindi Meaning

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sanskrit shlok with meaning in hindi

हेलो मित्रों , आज के लेख में आपको हम बेहतरीन संस्कृत श्लोक- Sanskrit Shlok  के बारे में बताने जा रहे है। भारत में बहुत सारे लोग ऐसे है जो संस्कृत को बेहद पसंद करते है। उन्हें संस्कृत श्लोक बोलना और पढ़ना बहुत ही पसंद होता है।

संस्कृत हमारी भारत की प्राचिन भाषा है। संस्कृत का अध्ययन करना बहुत ही श्रेष्ठ माना जाता है। क्या आप भी संस्कृत श्लोक (Sanskrit Shlok ) के दीवाने हो ? अगर आपका जवाब हाँ है , तो यह लेख आपके लिए ही है। यहाँ पर आपको सबसे बेस्ट संस्कृत श्लोक – Easy sanskrit shlok मिलने वाले है।

आज के लेख में हम आपको बहुत से श्रेष्ठ , बेहतरीन और अच्छे संस्कृत श्लोक को भावार्थ के साथ – Sanskrit Shlok with hindi meaning बताने वाले है। आपके लिए हमने बेस्ट संस्कृत श्लोक (Sanskrit Shlok in hindi ) का चयन किया है। आपको जरूर पसंद आयेगा।

संस्कृत श्लोक | Sanskrit Shlok with hindi Meaning

  • अग्निशेषम् ऋणशेषम् शत्रुशेषम् तथैव च |
    पुनः पुनः प्रवर्धेत तस्मात् शेषम् न कारयेत् ||

यदि कोई आग, ऋण, या शत्रु न्यूनतम सीमा तक भी अस्तित्व में बचा रहेगा तो बार बार बढ़ेगा ; अत: इन्हें थोड़ा सा भी बचा नही रहने देना चाहिए। इन तीनों को सम्पूर्ण रूप से समाप्त ही कर डालना चाहिए।

  • चिता चिंता समाप्रोक्ता, बिंदुमात्रं विशेषता।
    सजीवं दहते चिंता, निर्जीवं दहते चिता॥

चिता और चिंता समान कही गयी हैं पर चिंता में एक बिंदु की विशेषता है; चिता तो मरे हुए को ही जलाती है पर चिंता जीवित व्यक्ति को |

  • गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
    गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम ।

  • न ही कश्चित् विजानाति, किं कस्य श्वो भविष्यति।
    अतः श्वः करणीयानि, कुर्यादद्यैव बुद्धिमान् ॥

कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता है इसलिए कल के करने योग्य कार्य को आज कर लेने वाला ही बुद्धिमान है ।।

  • दूरस्थोऽपि न दूरस्थो, यो यस्य मनसि स्थितः।
    यो यस्य हृदये नास्ति, समीपस्थोऽपि दूरतः॥

जो जिसके मन में बसता है वह उससे दूर होकर भी दूर नहीं होता और जिससे मन से सम्बन्ध नहीं होता वह पास होकर भी दूर ही होता है।

  • शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।
    न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा॥

जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं ,वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है वह कुल सदैव फलता फूलता और समृद्ध रहता है।

  • विद्वत्वं च नृपत्वं च , न एव तुल्ये कदाचन्।
    स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ||

विद्वता और राज्य अतुलनीय हैं, राजा को तो अपने राज्य में ही सम्मान मिलता है पर विद्वान का सर्वत्र सम्मान होता है।

  • उद्यमेनैव हि सिध्यन्ति, कार्याणि न मनोरथै।
    न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मृगाः॥

प्रयत्न करने से ही कार्य पूर्ण होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं, सोते हुए शेर के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते हैं ।

  • यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
    यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।

जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती है, उनका सम्मान नही होता है वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं।

 

प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक

  • विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।
    पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥

विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन की प्राप्ति होती है, धन से धर्म और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।।

  • कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः।
    कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥

काल सभी जीवो को निपुणता प्रदान करता है। वही सभी जीवो का संहार भी करता है। वह जागता रहता है जब सब सो जाते है। काल को कोई जीत नहीं सकता।

  • अश्रुतश्च समुत्रद्धो दरिद्रश्य महामनाः।
    अर्थाश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः॥

बिना पढ़े ही स्वयं को ज्ञानी समझकर अहंकार करने वाला, दरिद्र होकर भी बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाने वाला तथा बैठे-बिठाए धन पाने की कामना करने वाला व्यक्ति मूर्ख कहलाता है।

  • द्वेष्यो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डितः ।
    प्रिये शुभानि कार्याणि ट्वेष्ये पापानि चैव ह ॥

जिस पर द्वेष हो, वह हमारी दृष्टि में न कभी सज्जन दिखता है, न बुद्धिमान् और न ही विद्वान्। प्रिय व्यक्ति में सभी गुण शुभ लगते है तथा अप्रिय में सभी पाप दिखते हैं।

  • आत्मज्ञानं समारम्भः तितिक्षा धर्मनित्यता।
    यमर्थात्रापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

जो अपनी योग्यता से भली-भाँति परिचित हो और उसी के अनुसार कल्याणकारी कार्य करता हो, जिसमें दुःख सहने की शक्ति हो, जो विपरीत स्थिति में भी धर्म-पथ से विमुख नहीं होता, ऐसा व्यक्ति ही सच्चा ज्ञानी कहलाता है।

  • एको धर्म: परम श्रेयः क्षमैका शान्तिरुक्तमा।
    विद्वैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है, एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देने वाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देने वाली है।

  • द्वाविमौ पुरुषौ राजन स्वर्गस्योपरि तिष्ठतः।
    प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान्॥

जो व्यक्ति शक्तिशाली होने पर क्षमाशील हो तथा निर्धन होने पर भी दानशील हो – इन दो व्यक्तियों को स्वर्ग से भी ऊपर स्थान प्राप्त होता है।

  • निषेवते प्रशस्तानी निन्दितानी न सेवत।
    अनास्तिकः श्रद्धान एतत् पण्डितलक्षणम्॥

सद्गुण, शुभ कर्म, भगवान के प्रति श्रद्धा और विश्वास, यज्ञ, दान, जन-कल्याण आदि, ये सभी ज्ञानीजनों के शुभ-लक्षण होते हैं।

  • अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
    पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥

बुद्धि, उच्च कुल, इंद्रियों पर काबू, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, कम बोलना, यथाशक्ति दान देना तथा कृतज्ञता – ये आठ गुण मनुष्य की ख्याति बढ़ाते हैं।

  • क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति विज्ञाय चार्थ भते न कामात्।
    नासम्पृष्टो व्युपयुक्ते परार्थे तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य॥

ज्ञानी लोग किसी भी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, लेकिन उसे धैर्यपूर्वक देर तक सुनते रहते हैं। किसी भी कार्य को कर्तव्य समझकर करते है, कामना समझकर नहीं और व्यर्थ किसी के विषय में बात नहीं करते।

Sanskrit Shlok | Shlok in Sanskrit with Meaning in Hindi

  • अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च
    कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम्

जो व्यक्ति शत्रु से दोस्ती करता है तथा मित्र और शुभचिंतकों को दुःख देता है, उनसे ईर्ष्या-द्वेष करता है। सदैव बुरे कार्यों में लिप्त रहता है, ऐसा व्यक्ति मूर्ख कहलाता है।

  • एकः क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपलभ्यते ।
    यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ।।

क्षमाशील व्यक्तियों में केवल एक ही दोष होता है, दुसरे किसी दोष की संभावना ही नही होती है और वह दोष यह है की ऐसे व्यक्तियों को लोग असमर्थ समझ लेते हैं।

  • जन्मना जायते शुद्र:संस्कारात् द्विज् उच्यते|
    वेदपाठाद्धवेद् विप्रः ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः ॥

व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।

  • निन्दन्तु नीतिनिपुणा, यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मीः स्थिरा भवतु, गच्छतु वा यथेष्टम् ।
    अद्यैव वा मरणमस्तु, युगान्तरे वान्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति, पदं न धीराः ।।

नीति में निपुण मनुष्य चाहे निंदा करें या प्रशंसा, धन या लक्ष्मी आयें या इच्छानुसार चली जायें । आज ही मृत्यु हो जाये या फिर युगों के बाद हो, परन्तु धैर्यवान मनुष्य कभी भी न्याय के पथ से डगमग नही होते है

  • गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्।
    वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः

न बीते हुए कल के बारे में सोच कर शोक करना चाहिए और न ही आनेवाले कल की चिंता। विचक्षण बुद्धिमान व्यक्ति वर्तमान में जीता है, कर्म करता है और भविष्य उज्ज्वल बनाता है।

  • अर्थातुराणां न सुख न निद्रा कामातुराणां न भयं न लज्जा ।
    विद्यातुराणां न सुखं न निद्रा क्षुधातुराणां न रुचिर्न बेला ।।

अर्थ (सम्पत्ति) से आतुर (इच्छा रखनेवाले) सुख और निद्रा की, काम (रति) से आतुर भय तथा लज्जा की, विद्या से आतुर सुख एवं निद्रा की, भूख से आतुर रुचि और समय की चिंता नहीं करते।

  • आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा दीर्घमुपैति पश्चात् ।
    दिनस्य पूर्वार्धपरार्धभिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्

दुर्जनों के साथ मित्रता दिन के पूर्वार्ध में छाया की तरह होती है आरंभ में लम्बी , गहरी तथा धीरे धीरे कम होती हुई। सज्जनों के साथ मित्रता दिन के परार्ध में छाया की तरह होती है आरंभ में कम, परंतु धीरे धीरे गहरी होती हुई।

  • न विद्यया विना सौख्यं नराणां जायते ध्रुवम् ।
    अतो धर्मार्थमोक्षेभ्यो विद्याभ्यासं समाचरेत् ।।

विद्या के बिना मनुष्य को जीवन में कदापि सुख प्राप्ति नहीं होती। अतः धर्म, अर्थ की प्राप्ति तथा अज्ञान से मोक्ष के लिए विद्याभ्यास करना आवश्यक है।

  • मूर्खस्य पञ्च चिन्हानि गर्वो दुर्वचनं तथा ।
    क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः ।।

मूर्ख व्यक्ति के पांच लक्षण हैं – गर्व (अहंकार), बुरी वाणी, क्रोध, दृढवाद और दूसरों के वचनो का अनादर ।

  • व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं।
    आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्

व्यायाम से सुस्वास्थ्य, दीर्घ आयुष्य, बल तथा सुख प्राप्त होता है। आरोग्य ही परम भाग्य है। स्वास्थ्य ही सर्व प्रकार के अर्थ की प्राप्ति का साधन है।

  • वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च ।
    अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ।।

वृत्त (सदाचार) का संरक्षण करना चाहिए, वित्त (धन) तो आता जाता रहेगा। जो वित्त से क्षीण (गरीब) है, वह क्षीण नहीं, परंतु जिससे वृत्त नष्ट हुआ वह सदा के लिए नष्ट हो जाता है।

  • एकभुक्तं सदारोग्यं द्विभुक्तं बलवर्धनम्।
    त्रिभुक्तं च सदारोगं चतुर्भुक्तं तु मारकम्

दिन में एक बार भोजन करने से आरोग्य अच्छा रहता है। दो बार करने से शारीरिक बल बढ़ता है। तीन बार करने से सदा रोग होता है। चार बार करने से मृत्यु का करण बने ऐसी घातक बिमारी हो सकती है।

  • उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम् ।
    सोत्साहस्यास्ति लोकेऽस्मिन् न किञ्चिदपि दुर्लभम् ।।

हे आर्य, उत्साह बलवान है। उत्साह से अधिक बलवान कुछ नहीं है। जो व्यक्ति उत्साही है, उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

  • वेशं न विश्वसेत् प्राज्ञः वेशो दोषाय जायते ।
    रावणो भिक्षुरूपेण जहार जनकात्मजाम्

(केवल बाह्य) वेश पर विश्वास नही करना चाहिए, वेश दोषयुक्त (झूठा) भी हो सकता है। रावण ने भिक्षुक का रुप लेकर ही सीता माता का हरण किया था।

  • यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।
    न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत्

जिस देश (स्थानविशेष) पर सम्मान न मिले न हि कोई आजीविका (नोकरी धंधा)मिले न कोई स्वजन रहता हो न विद्याप्राप्ति होती हो, उस स्थान पर कदापि नहीं रहना चाहिए।

  • धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम् ।
    धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्

धर्म से अर्थ (अर्थपूर्ण सम्पत्ति) की उत्पत्ति होती है, धर्म से सुख की उत्पत्ति होती है। धर्म से ही सब प्राप्त होता है, क्यों कि धर्म ही जगत का सार है।

  • न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान् ।
    चिद्रूपोंऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर ।।

न तुम देह (शरीर) हो, न यह शरीर तुम्हारा है। न तुम भोग करते हो, न कर्म। तुम चैतन्यरूप हो, सदा साक्षी हो, निरपेक्ष (इच्छा रहित) हो.. इस लिए सुखी रहो।

  • मूर्खाः यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसंचितम् ।
    दम्पत्योः कलहो नास्ति तत्र श्री स्वयमागता।।

जहाँ मूर्ख की पूजा (सम्मान) न हो, धान्य (भोजन) का संचय होता हो, वैवाहिक-जीवन में कलह न हो, वहाँ श्री अर्थात् समृद्धि स्वयं ही आती है।

  • पापान्निवारयति योजयते हिताय गुह्यं च गृहति गुणान् प्रकटीकरोति
    आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
    सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः ।।

सत्पुरुषों द्वारा कहा गया है कि सन्मित्र वही है जो पापकर्म का निवारण करे, हितकार्य मे नियोजन करे, गोपनीय बातों को उजागर न करे, गुणों को सबके सामने कहे, आपत्ति में त्याग न करे तथा सही समय पर सहायता करे।

  • नाऽत्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्
    छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जस्तिष्ठन्ति पादपाः।।

अपने व्यवहार में बहुत सीधे ना रहे, यदि वन जाकर देखें तो पायेंगे की सीधे पेड़ो को काट लिया गया और जो पेड़ आड़े तिरछे हैं वो खड़े है।

  • यावद्वित्तोपार्जनसक्तः तावन्निजपरिवारो रक्तः ।
    पश्चाज्जर्जरभूते देहे वार्ता कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥

जब तक व्यक्ति धनोपार्जन में समर्थ है,तब तक परिवार में सभी उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हैं परन्तु अशक्त हो जाने पर उसे सामान्य बातचीत में भी नहीं पूछा जाता है।

  • अचोद्यमानानि यथा, पुष्पाणि फलानि च |
    स्वं कालं नातिवर्तन्ते, तथा कर्म पुरा कृतम् ||

जैसे फूल और फल बिना किसी की प्रेरणा से स्वतः समय पर प्रकट हो जाते हैं और समय का अतिक्रमण नहीं करते, उसी प्रकार पहले किये कर्म भी यथासमय ही अपने फल (अच्छे या बुरे) देते हैं। अर्थात् कर्मों का फल अनिवार्य रूप से प्राप्त होता है।

  • ईर्ष्यी घृणि न संतुष्टः क्रोधिनो नित्यशङ्कितः |
    परभाग्योपजीवीं च षडेते नित्य दुःखिता ||

अन्य व्यक्तियों से घृणा करने वाला, ईर्ष्या करने वाला,सदा असन्तुष्ट रहने वाला, क्रोधी, सदैव शङ्का करने वाला ,दूसरों पर आश्रित रहने वाला, ऐसे छ: प्रकार के व्यक्ति नित्य (सदैव) दुःखी रहते हैं |

  • निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
    करालं महाकालकालं कृपालं ।गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ।।

निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत) वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलाशपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे परमेशवरको मैं नमस्कार करता हूँ।

Sanskrit Shlok in hindi  | Sanskrit Shlok with Meaning

  • नास्ति मातृसमा प्रिया।

माँ जैसा कोई प्रिय नहीं।

  • कालोऽयं विलयं याति भुतर्गते क्षणे क्षणे ।

प्रत्येक क्षण, समय अतीत की खाई में गायब हो जाता है।

  • अंधं तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते |

जो केवल भौतिक ज्ञान की उपासना करते है, वें अंधःकार में प्रवेश करते है।

  • विक्लवो वीर्यहीनो यः स दैवमनवर्तते।
    बीराः संभावितात्मानो न दैवं पर्युपासते ।

जो कायर और संकोची है वही भाग्य में मानते हैं। वीर एवं आत्मविश्वासी लोग भाग्य के भरोसे नहीं रहते।

  • सर्वशालापुराणेषु ब्यासस्य वचनं ध्रुवम् |
    परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥

सभी शान और पुराणों मे, महंत व्यास के इस कथन को सत्य मानते है। दुसरो का भला करने से पुण्य प्राप्त होता है, और नुकशान पहुँचाने से पाप।

  • सत्यमेव परं ब्रह्म सत्यमेव परं तपः।
    सत्यमेव परो यज्ञःसत्यमेव परं श्रुतम्॥

सत्य ही परब्रह्म है, सत्य ही परम तप है, सत्य ही परम यज्ञ है और सत्य ही सर्वश्रेष्ठ शास है।।

  • यत् भावो तत् भवति

आप जैसा सोचते है वैसे ही बन जाते है।

  • गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् ।
    वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः ॥

हम उसके लिए ना पछताए जो बीत गया, हम भविष्य की चिंता भी ना करे, विवेक बुद्धि रखने वाले लोग केवल वर्तमान में जीते है.

  • चरन्ति वसुधां कृत्स्नां वावढूका बहुशुताः

बुद्धीमान् और वाक्-कुशल लोग, सारी पृथ्वी घुमते है।

  • श्रमम विना न किमपी साध्याम

बिना प्रयासों के, कुछ भी संभव नहीं है।

  • कश्चित् कस्यचिन्मित्रं, न कश्चित् कस्यचित् रिपुः ।
    अर्थतस्तु निबध्यन्ते, मित्राणि रिपवस्तथा॥

न कोई किसी का मित्र है और न ही शत्रु , कार्यवश ही लोग मित्र और शत्रु बनते हैं ।

  • शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।।

शरीर ही सभी धर्मो (कर्तव्यों) को पूरा करने का साधन है।

  • नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
    न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।

इस आत्मा को शस्त्रनही काट सकते, इसको आग नही जला सकती, इसको जल नही गला सकता और वायु नही सुखा सकती।

  • पापं प्रज्ञां नाशयति क्रियमाणं पुनः पुनः।
    नष्टप्रज्ञः पापमेव नित्यमारभते नरः

जब कोई बार-बार पाप करता है, उसकी बुद्धि(प्रज्ञा) और ज्ञान नष्ट हो जाता है। बुद्धि के नष्ट हो जाने पर, वह व्यक्ति निरंतर पाप ही करता  है ।

  • ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।
    मृत्योर्मामृतं गमय ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः॥

हे सर्वशक्तिमान! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर,  ॐ शांति! शांति! शांति!

  • कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना को न पीडितः।
    व्यसनं केन न प्राप्त कस्य सौख्यं निरन्तरम्।।

इस दुनिया में ऐसा किस का घर है जिस पर कोई कलंक नहीं, वह कौन है जो रोग और दुख से मुक्त है? सदा सुख किस को रहता है?

  • एको धर्म: परम श्रेयः क्षमैका शान्तिरुक्तमा।
    विद्वैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा ॥

केवल धर्म-मार्ग ही परम कल्याणकारी है, केवल क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ट उपाय है, केवल ज्ञान ही परम संतोषकारी है तथा केवल अहिंसा ही सुख प्रदान करने वाली है।

  • तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः |
    वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||

कर्मयोगी साधक उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके मेरे परायण होकर बैठे क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।

  • जलै तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि।
    प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारे वस्तुशक्तितः।।

पानी पर तेल, एक कमीने आदमी को बताया हुआ राज, एक लायक व्यक्ति को दिया हुआ दान और एक बुद्धिमान व्यक्ति को पढाया हुआ शास्त्रों का ज्ञान अपने स्वभाव के कारण तेजी से फैलते है।

  • प्रस्तवासदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम् ।
    आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः ।।

वही पंडित है, जो वही बात बोलता है जो प्रसंग के अनुरूप हो। जो अपनी शक्ति के अनुरूप दुसरो की प्रेम से सेवा करता है, जिसे अपने क्रोध की मर्यादा का पता है।

  • यदेवोपनतं दुःखात् सुखं तद्रसवत्तरं।
    निर्वाणाय तरुच्छाया तप्तस्य हि विशेषतः ॥

एक दुःख के बाद जो सुख मिलता है वह सब अधिक सुखद होता है। जो सूर्य की तीव्र गर्मी से पीड़ित है, वह एक पेड़ द्वारा दी गई छाया का आनंद लेता है, जो सूर्य की किरणों के संपर्क में नहीं है।

  • चन्दनम् शीतलम् लोके चंदनादपि चंद्रमाः |
    चन्द्र चन्दनयोः मध्ये शीतला साधुसङ्गतिः

संसार में चन्दन को शीतल माना जाता है लेकिन चन्द्रमा चन्दन से भी शीतल होता है। अच्छे मित्रों का साथ चन्द्र और चन्दन दोनों की तुलना में अधिक शीतलता देने वाला होता है |

  • सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
    नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।

अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर, आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है।

Top Easy Sanskrit Shlok 

  • क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी ।
    विद्या कामदुधा धेनुः संतोषो नन्दनं वनम् ॥

क्रोध साक्षात् यम है। तृष्णा नरक की ओर ले जाने वाली वैतरणी है। ज्ञान कामधेनु है और संतोष ही तो नंदनवन है।

  • लये संबोधयेत् चित्तं विक्षिप्तं शमयेत् पुनः।
    सकशायं विजानीयात् समप्राप्तं न चालयेत्।॥

जब चित्त निष्क्रिय हो जाये, तो उसे संबुद्ध करो। संबुद्ध चित्त जब अशान्त हो, उसे स्थिर करो। चित्त पर जमे मैल (अहंकार तथा अज्ञानता) को पहचानो । समवृत्ति को प्राप्त होने पर इसे फिर विचलित मत करो ।

  • विवादो धनसम्बन्धो याचनं चातिभाषणम् ।
    आदानमग्रतः स्थानं मैत्रीभङ्गस्य हेतवः॥

वाद-विवाद, धन के लिये सम्बन्ध बनाना, माँगना, अधिक बोलना, ऋण लेना, आगे निकलने की चाह रखना – यह सब मित्रता के टूटने में कारण बनते हैं।

  • भोजनान्ते पिबेत्तकं वासरान्ते पिबेत्पयः ।
    निशान्ते च पिबेट्वाटि त्रिभिटोंगो न जायते ॥

भोजन के अन्त में मट्टे का, दिन के अन्त में दूध का, और रात के अन्त में (अर्थात् सुबह) पानी का सेवन करने से रोग उत्पन्न नही होता।

  • युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
    युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥

जो खाने, सोने, आमोद-प्रमोद तथा काम करने की आदतों में नियमित रहता है, वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भौतिक क्लेशों को नष्ट कर सकता है।

  • शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतलङ्घनम्।
    शनैर्विद्या शनैर्वित्तं पञ्चैतनि शनैः शनैः॥

राह धीरे धीरे कटती है, कपड़ा धीरे धीरे बुनता है, पर्वत धीरे धीरे चढा जाता है, विद्या और धन भी धीरे-धीरे प्राप्त होते हैं, ये पाँचों धीरे धीरे ही होते हैं

  • जीवेषु करुणा चापि मैत्री तेषु विधीयताम्।

जीवों पर करुणा एवं मैत्री कीजिये।

  • सिंहवत्सर्ववेगेन पतन्त्यर्थे किलार्थिनः॥

जो कार्य संपन्न करना चाहते हैं, वे सिंह की तरह अधिकतम वेग से कार्य पर टूट पड़ते हैं।

आरोप्यते शिला शैले यथा यत्नेन भूयसा।
निपात्यते सुखेनाधस्तथात्मा गुणदोषयोः॥

जैसे कोई पत्थर बड़े कष्ट से पहाड़ के ऊपर पहुँचाया जाता है पर बड़ी आसानी से नीचे गिर जाता है, वैसे ही हम भी अपने गुणों के कारण ऊँचे उठते हैं किंतु हम एक ही दुष्कर्म से आसानी से गिर सकते हैं ।

  • योगः कर्मसु कौशलम

योग ही कर्मों में कुशलता है।

  • धनानि भूमौ पशवश्च गोष्ठे भार्या गृहद्वारि जनः श्मशाने।
    देहश्चितायां परलोकमार्गे कर्मोनुगो गच्छति जीव एकः ॥

धन भूमि पर, पशु गोष्ठ में, पत्नी घर में, संबन्धी श्मशान में, और शरीर चिता पर रह जाता है। केवल कर्म ही है जो परलोक के मार्ग पर साथ-साथ आता है।

  • ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा।
    स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाश्स स्तनूभिव्व्यशेम देवहितं यदायुः।।

हे देव, हम अपने कानों से शुभ सुनें, अपनी आँखों से शुभ देखें, स्थिर शरीर से संतोषपूर्ण जीवन जियें, और देवों द्वारा दी गयी आयु उन्हें समर्पित करें।

  • उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
    आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

स्वयं अपना उद्धार करे अपना पतन न करे, क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।

  • कोऽन्धो योऽकार्यटतः को बधिटो यो हितानि न श्रुणोति।
    को मूको यः काले प्रियाणि वक्तुं न जानाति॥

अन्धा कौन है? जो बुरे कार्यों में संलग्न रहता है। बहरा कौन है? जो हितकारी बातों को नहीं सुनता। गूंगा कौन है? जो उचित समय पर प्रिय वाक्य बोलना नहीं जानता।

  • कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा
    नीचैर्च्छत्युपटिच दशा चक्रनेमिक्रमेण।।

किसी को भी सदा सुख और सदा दुख नही मिलता। पहियों के घेरे की तरह (जीवन में सुख दुख) उपर नीचे होते ही रहते है।

  • जरामृत्यू हि भूतानां रवादितारौ वृकाविव।
    बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि॥

बुढ़ापा और मृत्यु ये दोनों भेड़ियों के समान हैं जो बलवान, दुर्बल, छोटे और बड़े सभी प्राणियों को खा जाते हैं।

  • उत्थानेनामृतं लब्धमुत्थानेनासुरा हताः।
    उत्थानेन महेन्द्रेण श्रेष्ठ्यं प्राप्तं दिवीह च ॥

देवों ने भी प्रयत्नों से ही अमृत प्राप्त किया था, प्रयत्नों से ही असुरों का संहार किया था, तथा देवराज इन्द्र ने भी प्रयत्न से ही इहलोक और स्वर्गलोक में श्रेष्ठता प्राप्त की थी।

Best Shlok in Sanskrit | Sanskrit Shlok on life

  • आकिञ्चन्ये न मोक्षोऽस्ति किञ्चन्ये नास्ति बन्धनम्।
    किञ्चन्ये चेतरे चैव जन्तुर्ज्ञानेन मुच्यते॥

दरिद्रता में मोक्ष नहीं, और संपन्नता में कोई बन्धन नहीं । किन्तु दरिद्रता हो या संपन्नता, मनुष्य ज्ञान से ही मुक्ति पाता है।

  • यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रिया ।
    चित्ते वाचि क्रियायां च साधूनामेकरूपता ॥

जैसा मन होता है वैसी ही वाणी होती है, जैसी वाणी होती है वैसे ही कार्य होता है। सज्जनों के मन, वाणी और कार्य में एकरूपता (समानता) होती है।

  • अतितृष्णा न कर्तव्या तृष्णां नैव परित्यजेत् ।
    शनैः शनैश्च भोक्तव्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम्

अत्यधिक इच्छाएँ नहीं करनी चाहिए पर इच्छाओं का सर्वथा त्याग भी नहीं करना चाहिए। अपने कमाये हुए धन का धीरे धीरे उपभोग करना चाहिये ।

  • यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।
    न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत् ।।

जिस देश में सम्मान न हो, जहाँ कोई आजीविका न मिले जहाँ अपना कोई भाई बन्धु न रहता हो और जहाँ विद्या-अध्ययन सम्भव न हो,ऐसे स्थान पर नहीं रहना चाहिए।

  • यदा, यदा, हि, धर्मस्य, ग्लानिः, भवति, भारत,
    अभ्युत्थानम्, अधर्मस्य, तदा, आत्मानम्, सृजामिहम्

जब जब भी और जहां जहां भी, हे अर्जुन, पुण्य / धर्म की हानि होती है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब तब मैं अवतार लेता हूँ।

  • कर्मफल-यदाचरित कल्याणि ! शुभं वा यदि वाऽशुभम्।
    तदेव लभते भद्रे! कर्त्ता कर्मजमात्मनः ॥

मनुष्य जैसा भी अच्छा या बुरा कर्म करता है उसे वैसा ही फल मिलता है। कर्ता को अपने कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है।

  • आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।

व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन आलस्य होता व्यक्ति का परिश्रम ही उसका सच्चा मित्र होता है।

  • ” अति सर्वनाशहेतुमुतोऽत्यन्तं विवर्जयेत्। “

अति सर्वनाश का कारण है। इसलिये अति का सर्वथा परिहार करे।

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि

महादिपाश् च तटे रमन्त सम्पुज्यमानं सततं मुनीन्द्रः ।
सुरासुरैर्यक्षमहोरखगावयैः केवारमीशं शिवमेकमीडे ।।

माघे मासे महादेवः यो दास्यति घृतकम्बलम ।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति

कर्मभ्यो भीयतां नित्य मा सुरेशात कदाचन।
ईश्वर क्षमते लोकान्कर्माणि न त्यजन्ति च।।

लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् कामः प्रजायते ।
लोभात् मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम् ।।

पितृपैतामहं राज्यं प्राप्तवान् स्वेन कर्मणा।
वायुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशयत्यनये स्थितः ॥

हे मातृभूमे, प्राणत्यागः तवार्थे जीवनम् ।
विना त्वां जिवनमपि मटणम् एवं ॥

प्रत्येकं सफलं कर्म भवेदिति न निश्चितम् ।
सन्तोषो मनसः येन तत्साफल्यादुनं न हि ।।

दह्यमानां सुतीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना।
अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते॥

 

हमने आपको ऊपर के लेख में बहुत सारे बेस्ट संस्कृत श्लोकों – Sanskrit Shlok के बारे में बताया है। आशा है आपको पसंद आये होंगे। हमने सभी संस्कृत श्लोकों को बारीकी के साथ चयन किया है। जिसके कारण आपको यह संस्कृत श्लोक बहुत ही उपयोगी होंगे।

हमने नीचे दिए सभी प्रकार के संस्कृत श्लोको के बारे में आपको बताया हुआ है।

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